English version के लिए कृपया यहाँ जाएँ: T1-17: Cyclical and Non-Cyclical Industries
कुछ बिज़नेस ऐसे होते हैं जिनकी डिमांड (demand या माँग) और कमाई इकोनॉमी (economy या अर्थव्यवस्था) के उतार-चढ़ाव के साथ ऊपर-नीचे होती है, जबकि कुछ बिज़नेस हर माहौल में एक समान गति से चलते रहते हैं। आज हम इन दोनों टाइप (type या प्रकार) के बिज़नेस और इंडस्ट्रीज़ (industries या उद्योगों) के बारे में समझेंगे।
साइक्लिकल इंडस्ट्रीज़ (Cyclical Industries)
जब इकोनॉमी में तेज़ी होती है और लोगों की इंकम (income या आमदनी) बढ़ती है, तो कुछ खास कंपनियों के प्रॉडक्ट्स (products या सामान) और सर्विसेस (services या सेवाओं) की बिक्री बढ़ती है। वहीं जब मंदी आती है, तो लोग इन एक्सपेन्सेस (expenses या ख़र्चों) को सबसे पहले रोक देते हैं। ऐसे बिज़नेस को साइक्लिकल इंडस्ट्रीज़ (Cyclical Industries या आर्थिक चक्र से जुड़े उद्योग) कहा जाता है।
साइक्लिकल कंपनियों की इंकम (income या आय) इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों के पास ख़र्च करने के लिए कितनी डिस्पोज़ेबल इंकम (disposable income या अतिरिक्त पैसा) है। जब इकोनॉमी अच्छी स्थिति में होती है और लोगों को अपनी नौकरी या बिज़नेस की सुरक्षा पर कॉन्फ़िडेंस (confidence या भरोसा) होता है, तब गाड़ियों की ख़रीद, घूमना-फिरना, होटल, फ़्लाइट्स (flights या हवाई यात्रा) और महंगे होम रीनोवेशन (home renovation या घर का सुधार) जैसे ख़र्चे ज़्यादा होते हैं। इसके विपरीत, जब इकोनॉमी वीक (weak या ढीली) होती है, तो लोग नई गाड़ी ख़रीदना टाल देते हैं और छुट्टियाँ बिताने बाहर नहीं जाते। यही कारण है कि गाड़ी, टूरिज़्म (tourism या पर्यटन) और लक्ज़री आइटम्स (luxury items या महंगा सामान) बनाने वाली कंपनियाँ साइक्लिकल बिज़नेस का हिस्सा हैं।
नॉन-साइक्लिकल इंडस्ट्रीज़ (Non-Cyclical Industries)
दूसरी तरफ़ ऐसी कंपनियाँ होती हैं जिनके प्रॉडक्ट्स और सर्विसेस की ज़रूरत लोगों को हमेशा बनी रहती है, चाहे इकोनॉमी में तेज़ी हो या मंदी। इन्हें नॉन-साइक्लिकल इंडस्ट्रीज़ (Non-Cyclical Industries या आर्थिक चक्र से नहीं जुड़े उद्योग) या डिफेंसिव बिज़नेस (defensive business या रक्षात्मक बिज़नेस) कहा जाता है।
घर का राशन, साबुन-तेल, दवाइयाँ, बिजली और गैस जैसी बुनियादी चीज़ों की ख़रीद लोग मंदी में भी बंद नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, वीक इकोनॉमी में भी एक परिवार अपने घर की बिजली का बिल भरेगा ही और ज़रूरी राशन ख़रीदेगा ही। इसलिए FMCG (Fast-Moving Consumer Goods या रोज़मर्रा का सामान), हेल्थकेयर (Healthcare या स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएँ) और यूटिलिटीज़ (utilities या ज़रूरी सेवाएँ) जैसी कंपनियाँ नॉन-साइक्लिकल बिज़नेस में आती हैं।
बैलेन्स्ड पोर्टफ़ोलियो (Balanced Portfolio)
आपके द्वारा रखे गए शेयरों के बास्केट (basket) को पोर्टफ़ोलियो (portfolio) कहते हैं।
एक बैलेन्स्ड (balanced या संतुलित) पोर्टफ़ोलियो बनाते समय साइक्लिकल और नॉन-साइक्लिकल दोनों तरह के बिज़नेस का होना अच्छा होता है। नॉन-साइक्लिकल कंपनियाँ रिसेशन (recession या मंदी) के समय आपके इन्वेस्टमेंट को स्टेबिलिटी (stability या स्थिरता) देती हैं और एक रिलाइबल (reliable या भरोसेमंद) रिटर्न, जैसे कि डिविडेंड्स, दे पाना पॉसिबल (possible या मुमकिन) होता है। दूसरी तरफ़, जब इकोनॉमी में तेज़ी आती है, तो साइक्लिकल कंपनियाँ आपके पोर्टफ़ोलियो के रिटर्न को ऊपर ले जाने में मदद कर सकती हैं। इन दोनों का बैलेंस (balance या संतुलन) आपके इन्वेस्टमेंट्स को अलग-अलग इकोनॉमिक (economic या आर्थिक) सिचुएशन को संभालने में मदद कर सकता है।
समरी (Summary)
साइक्लिकल कंपनियाँ इकोनॉमी की तेज़ी में अच्छा प्रदर्शन कर सकती हैं, लेकिन मंदी के समय उनकी इंकम घट सकती है। इसके ऑपोज़िट (opposite या विपरीत), नॉन-साइक्लिकल कंपनियाँ बेसिक नेसेसिटीज़ (basic necessities या बुनियादी ज़रूरतों) से जुड़ी होने के कारण हर दौर में स्टेबल डिमांड (stable demand या स्थिर माँग) और इंकम बनाए रख सकती हैं। पोर्टफ़ोलियो में दोनों प्रकार की कंपनियों का मिक्स (mix या मिश्रण) रखने से मंदी के समय सेफ्टी (safety या सुरक्षा) और तेज़ी के समय बेहतर ग्रोथ (growth या वृद्धि) का फ़ायदा मिल सकता है।
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