English version के लिए कृपया यहाँ जाएँ: T1-21: Other Financial Instruments – Commodities and Derivatives
आजकल इन्वेस्टमेंट्स की बात आते ही कमोडिटीज़ और डेरिवेटिव्स में फटाफट मोटा पैसा बनाने की चर्चा छिड़ जाती है। कभी कच्चे तेल या सोने-चांदी के उतार-चढ़ाव, तो कभी ऑप्शंस ट्रेडिंग (options trading) को रातों-रात अमीर बनने का शॉर्टकट बनाकर पेश किया जाता है।
इस ज़ोरदार मार्केटिंग के बहकावे में आने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि कमोडिटीज़ और डेरिवेटिव्स असल में किस मकसद से बने थे, और क्या लंबे समय में वेल्थ बनाने में इनका कोई रोल है भी या नहीं।
कमोडिटीज़ और डेरिवेटिव्स को समझना
इन दोनों को आसान शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है:
- कमोडिटीज़ (commodities): कच्चा तेल, सोना, चांदी या कपास जैसे कच्चे माल को कमोडिटी कहा जाता है। इनका इस्तेमाल हमारी रोज़ की ज़िंदगी में या फैक्ट्रियों में सामान बनाने के लिए होता है।
- डेरिवेटिव्स (derivatives): ये ऐसे फाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट्स हैं, जिनकी अपनी कोई स्वतंत्र वैल्यू नहीं होती। इनकी कीमत किसी शेयर, इंडेक्स या कमोडिटी के भाव पर टिकी होती है। किसी शेयर या इंडेक्स का डेरिवेटिव खरीदने से आपको उस बिज़नेस में कोई वास्तविक हिस्सेदारी या वोटिंग का अधिकार नहीं मिलता।
इनके बनने की असली वजह बनाम गलत इस्तेमाल
डेरिवेटिव्स आम इन्वेस्टर्स की कमाई के लिए नहीं, बल्कि कारोबारियों के रिस्क को काबू में रखने के लिए बनाए गए थे, जिसे हेजिंग (hedging) कहते हैं।
- कारोबारी हेजिंग: किसान फसल कटने से पहले ही आने वाले समय का भाव तय कर लेता है, और कंपनियां कच्चे माल की कीमतें बढ़ने के डर से पहले ही सौदे बुक कर लेती हैं, जिन्हें फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स (futures contracts) कहा जाता है।
- लेवरेज का लालच: डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स को बहुत कम पैसों में भारी-भरकम सौदे करने की सुविधा देते हैं, जिसे लेवरेज (leverage) कहते हैं। चाहे कमोडिटीज़ हों, मार्केट इंडेक्स हो या व्यक्तिगत शेयर्स, रिटेल ट्रेडर्स इसी लेवरेज के लालच में फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) में कूद पड़ते हैं। लेकिन अगर बाज़ार ज़रा भी उलटा पड़ा, तो मिनटों में पूरी पूंजी साफ़ हो सकती है।
टैक्स और ब्रोकरेज कटने के बाद शॉर्ट-टर्म F&O ट्रेडिंग में ज़्यादातर लोग सिर्फ अपना पैसा गंवाते हैं। यह वेबसाइट लंबे समय में वेल्थ बनाने के लिए है, इसलिए हम ऐसे भारी रिस्क वाले शॉर्टकट्स से दूर रहने की सलाह देते हैं।
उत्पादक बिज़नेस बनाम कच्चा माल और F&O कॉन्ट्रैक्ट्स
- कच्चा माल और F&O कॉन्ट्रैक्ट्स कोई नई वैल्यू नहीं बनाते: गोदाम में पड़ा तेल या तांबा न कोई कमाई करता है और न डिविडेंड देता है। इसी तरह किसी शेयर या इंडेक्स पर बना फ्यूचर्स या ऑप्शंस (F&O) कॉन्ट्रैक्ट भी अपने आप में कुछ पैदा नहीं करता। यहाँ मुनाफे की उम्मीद पूरी तरह सिर्फ इस बात पर टिकी होती है कि समय खत्म होने से पहले कोई दूसरा इसे आपसे ज़्यादा दाम में खरीद ले।
- प्रोडक्टिव बिज़नेस वैल्यू बढ़ाते हैं: एक अच्छी कंपनी कच्चे माल को उपयोगी चीज़ों में बदलकर मुनाफा कमाती है और लगातार बढ़ती जाती है।
लंबे समय के इन्वेस्टर्स के लिए असली वेल्थ प्रोडक्टिव बिज़नेसेज का मालिक बनने से बनती है, कीमतों के उतार-चढ़ाव पर सट्टा लगाने से नहीं।
एक समझदार इन्वेस्टर का रास्ता
अगर आपको लगता है कि देश के विकास के साथ एनर्जी और इन्फ्रास्ट्रक्चर की मांग बढ़ेगी, तो कच्चे माल के फ्यूचर्स पर सट्टा लगाने के बदले आप उन अच्छी कंपनियों के शेयर्स, म्यूचुअल फंड्स या ईटीएफ खरीदें, जो इस कच्चे माल को प्रोसेस करके बेचती हैं और अच्छा प्रॉफ़िट बनाती हैं।
- इंडस्ट्रियल कंपनियां: तांबे या स्टील के रोज़ के भाव पर दांव लगाने के बजाय, इन्हें बनाने वाले बड़े मैन्युफैक्चरर्स में हिस्सेदारी रखें।
- एनर्जी सेक्टर: क्रूड ऑयल के रोज़-रोज़ के उतार-चढ़ाव के पीछे भागने से बेहतर है कि म्यूचुअल फंड्स, ईटीएफ या शेयर्स के ज़रिए बड़े एनर्जी प्रोड्यूसर्स और रिफाइनर्स के साथ जुड़ें।
शॉर्ट-टर्म F&O कॉन्ट्रैक्ट्स के बजाय अच्छे बिज़नेस का मालिक बनकर आप सीधे देश की तरक्की का हिस्सा बनते हैं। यहाँ आपका रिटर्न सिर्फ़ अंदाज़ों से नहीं, बल्कि कंपनियों की असली कमाई, ग्रोथ और डिविडेंड से बनता है।
समरी (Summary)
कमोडिटीज़ और डेरिवेटिव्स कंपनियों के कारोबारी रिस्क को हेज (hedge) करने के टूल्स हैं, न कि आम इन्वेस्टर्स के लिए वेल्थ बनाने का जरिया। शेयर्स, इंडेक्स या कमोडिटीज़ के फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) में ट्रेडिंग करना सिर्फ शॉर्ट-टर्म सट्टा है। असली इन्वेस्टिंग उन प्रोडक्टिव बिज़नेसेज का मालिक बनने में है, जो वैल्यू बढ़ाते हैं और समय के साथ कंपाउंड होते हैं।
आपके विचार
इस विषय के बारे में आपके अनुभव, सोच या सवाल से हम सभी को सीखने में मदद मिलेगी। अपनी बातें नीचे कमेंट्स में लिखकर ज़रूर बताएं!