T1-09: एसेट एलोकेशन (Asset Allocation)

इन्वेस्टमेंट्स के साधनों को ऐसेट (Asset) भी कहा जाता है।

डिवर्सिफिकेशन और ऐसेट एलोकेशन का संबंध

पिछले लेख में हमने देखा कि अपने सारे पैसे एक ही जगह लगाने के बजाय अलग-अलग कंपनियों या सेक्टरों में बांटना यानी डाइवर्सिफिकेशन क्यों ज़रूरी है। लेकिन केवल अलग-अलग कंपनियों के शेयर्स खरीद लेना ही काफी नहीं है। इस टाइप (type) के डाइवर्सिफिकेशन से आगे बढ़कर एक और कदम ले सकते हैं जिसे एसेट एलोकेशन कहते हैं।

एसेट एलोकेशन का मतलब है अपने पैसों को सिर्फ एक ही तरह के साधन (जैसे सिर्फ शेयर्स) में न रखकर, अलग-अलग तरह के साधनों—जैसे शेयर, फिक्स्ड डिपॉजिट, या सोने के बीच सोच-समझकर इनवेस्टमेंट करना।

हमने डाइवर्सिफिकेशन में जाना कि सभी इन्वेस्टमेंट के साधनों का प्रदर्शन हर परिस्थिति में एक जैसा नहीं होता। इसलिए इन्वेस्टमेंट अलग-अलग ऐसेट में करने से आपके इन्वेस्टमेंट्स का रिस्क और नुकसान कम हो सकता है। जैसे कि शेयरों की कीमत ऊपर-नीचे होती रहती है, लेकिन एफडी की वैल्यू चेंज (change) नहीं होती।

ऐसेट एलोकेशन पर्सनल (Personal) होता है!

एसेट एलोकेशन हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है, क्योंकि यह आपकी उम्र, समय, परिस्थिति और रिस्क लेने की कैपेसिटी (capacity) से जुड़ा है। एसेट एलोकेशन दो तरह से मदद करता है — एक, आपके कुल इन्वेस्टमेंट्स का रिस्क कम करना और दूसरा, आप उस इन्वेस्टमेंट्स को कितना समय दे सकतें हैं उसके अनुसार आप को हो सके उतना ज्यादा रिटर्न मिल सके।

अपने इन्वेस्टमेंट्स को इस तरह समझना और समय-समय पर अपनी ज़रूरतों के हिसाब से इस ऐसेट एलोकेशन के बैलन्स को अपडेट करते रहना चाहिए।

समरी (Summary)

डाइवर्सिफिकेशन जहां अलग-अलग कंपनियों में पैसे इन्वेस्ट करना है, वहीं एसेट एलोकेशन अलग-अलग तरह के ऐसेट्स के बीच अपनी परिस्थिति, समय, और रिस्क के अनुसार बैलन्स बनाना है।

आपके विचार

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Author: Sanjay

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