T1-03: बॉन्ड्स (Bonds) क्या होते हैं?

English version के लिए कृपया यहाँ जाएँ: What is a Bond?

सरल शब्दों में कहें तो बॉन्ड्स (Bonds) एक तरह के कर्ज के दस्तावेज होते हैं (जिन्हें हम IOUs या प्रॉमिसरी नोट / Promissory Note भी कह सकते हैं). जब आप किसी कंपनी या सरकार को पैसा उधार देते हैं, तो वे आपको बदले में एक बॉन्ड जारी करती हैं.

यह बॉन्ड मुख्य रूप से दो चीजों से मिलकर बनता है:

  • प्रिंसिपल रकम / मूलधन (Principal Amount): यह वह असली पैसा है जो आपने किसी कंपनी या सरकार को उधार दिया है.
  • ब्याज (Interest / Bond Coupon): आपके दिए गए प्रिंसिपल पर मिलने वाला रेगुलर ब्याज. फाइनेंस की दुनिया में इस ब्याज दर को कूपन‘ (Coupon) भी कहा जाता है.

इसलिए, बॉन्ड्स को डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Debt Instruments – यानी कर्ज के साधन) कहा जाता है. यहाँ बॉन्ड जारी करने वाली संस्था (Bond Issuer) उस निवेशक (Bond Holder) की कर्जदार बन जाती है जिसने उसे पैसा दिया है.

बॉन्ड्स कौन जारी करता है?

आमतौर पर बॉन्ड्स दो मुख्य संस्थाओं द्वारा जारी किए जाते हैं—सरकार द्वारा या बड़ी कंपनियों (Corporations) द्वारा.

1. सरकारी बॉन्ड्स (Government Bonds)

सरकारी बॉन्ड्स केंद्र सरकार, राज्य सरकारों या स्थानीय नगर निगमों (Municipalities) द्वारा जारी किए जाते हैं. भारत के हिसाब से इन्हें हम दो भागों में आसानी से समझ सकते हैं:

  • म्यूनिसिपल बॉन्ड्स (Municipal Bonds या Munis): ये बॉन्ड्स स्थानीय नगर निगम (जैसे मुंबई नगर निगम या आपके शहर का नगर निगम) अपने पब्लिक प्रोजेक्ट्स जैसे—सड़कें, पानी की सप्लाई या इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) बनाने के लिए फंड जुटाने के लिए जारी करते हैं. नगर निगम इन प्रोजेक्ट्स से होने वाली कमाई, टैक्स या फीस के जरिए इस खर्च को पूरा करते हैं और आपके उधार दिए गए पैसे पर ब्याज चुकाते हैं. इन्हें शॉर्ट में ‘Munis’ भी कहा जाता है, और कई मामलों में इनसे मिलने वाला ब्याज पूरी तरह या आंशिक रूप से टैक्सफ्री (Tax-Free) होता है.
  • गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (G-Secs / Treasury Bills): भारत में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI – Reserve Bank of India) केंद्र सरकार की तरफ से इन्हें जारी करता है. ये मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं: कम समय के लिए ट्रेजरी बिल्स (T-Bills) जिनकी मैच्योरिटी (Maturity) 1 साल से कम होती है, और लंबे समय के लिए सरकारी बॉन्ड्स (G-Secs) जिनकी मैच्योरिटी 5 से 40 साल तक हो सकती है. इनसे मिलने वाला ब्याज आमतौर पर आपकी इनकम टैक्स स्लैब (Marginal Tax Rate) के हिसाब से पूरी तरह टैक्स के दायरे में आता है. इसलिए इनमें Munis की तरह कोई स्पेशल टैक्स छूट नहीं मिलती.

2. कॉर्पोरेट बॉन्ड्स (Corporate Bonds)

ये प्राइवेट या सरकारी कंपनियों (Corporations) द्वारा जारी किए जाने वाले कर्ज के दस्तावेज होते हैं. इनकी समय सीमा (Maturity) कुछ महीनों से लेकर कई सालों तक की हो सकती है. सरकारी बॉन्ड्स की तरह ही, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में भी आपको प्रिंसिपल (मूलधन) और रेगुलर कूपन (ब्याज) का भुगतान मिलता है.

  • कन्वर्टिबल बॉन्ड्स (Convertible Bonds): कॉर्पोरेट बॉन्ड्स का एक मजेदार फीचर यह हो सकता है कि वे कन्वर्टिबल‘ (Convertible, यानी परिवर्तनीय) होते हैं. इसका मतलब है कि बॉन्ड होल्डर के पास एक तय समय के बाद अपने बॉन्ड्स को कंपनी के शेयरों (Shares) में बदलने का ऑप्शन होता है.

टैक्स नोट: कॉर्पोरेट बॉन्ड्स से मिलने वाली ब्याज की कमाई भी आपकी टैक्स स्लैब (Marginal Tax Rate) के अनुसार पूरी तरह टैक्सेबल होती है, इसमें कोई टैक्स एडवांटेज (Tax advantage) नहीं मिलता.

आगे आने वाली पोस्ट्स में हम इस बात पर गहराई से बात करेंगे कि एक आम retail इन्वेस्टर के रूप में आपको अपने इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो (Investment Portfolio) में बॉन्ड्स और स्टॉक्स के बीच सही बैलेंस कैसे बनाना चाहिए.

अगर बॉन्ड्स के बारे में आपको और कुछ जानना हो, तो अपने विचार हमें नीचे कमेंट्स में लिखकर जरूर बताएं।

Author: Sanjay

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